-रामबहादुर राय
‘मेरे पास सिर्फ पांच साल बचे हैं। अब मुझे पक्की बातें कह देनी चाहिए। जो देखा, समझा और अनुभव किया उसे लिख देने का यही समय है।’ अपना यह विचार एक लंबी बातचीत के दौरान प्रभाष जी ने बताया। तारीख थी- 12 अगस्त, 2007। उस दिन थोड़ी फुरसत में थे क्योंकि वह मुलाकात पहले से तय थी। उनका विचार सुनकर उत्साहित हुआ। उन्हें टोका और कहा- इसके लिए आपको अपनी यात्राएं कम करनी पड़ेंगी। वे सहमत हो गए। इससे लगा कि वे निश्चय कर चुके हैं। उनके 71वें जन्मदिन समारोह के बाद वह बातचीत हो रही थी। उस समारोह के लिए बहुत मुश्किल से उन्हें मनाया जा सका था। एक बात और बता दूं। गुणी और ज्ञानी नामवर सिंह ने उन्नाव की यात्रा में अकेले में बड़े आग्रह से कहा- प्रभाष जी के अमृत महोत्सव का इंतजार मत करिए। इनका 71वां उसी तरह मनाने की सोचिए। 27 नवंबर, 2006 को शिवमंगल सिंह सुमन की मूर्ति के अनावरण में जाते समय उन्होंने यह सलाह दी थी।
अपनी 71वीं सालगिरह के बाद प्रभाष जी ने उस योजना पर काम करना शुरू किया। गांधी शांति प्रतिष्ठान में दफ्तर बनाया। हम सबको उसे दिखाया। उन्होंने सोचा था कि रोज वहां पढ़ना-लिखना करेंगे। क्या लिखना है? इसकी धुन उनको सवार थी। इसका फैसला सोच-समझकर एक ट्रेन में रात को किया। देवघर से लौट रहे थे। विद्यापीठ की बैठक थी। उन्हें नींद नहीं आ रही थी। आसपास के यात्रियों को सोने में खलल न हो इसलिए लाइट जलाकर पढ़ने नहीं बैठे जैसा कि अक्सर घर पर किया करते थे। इसी साल 10 जुलाई की वह रात थी। अगले दिन बाबा बैजनाथ का प्रसाद देने के बाद बताया कि बैठकर उस रात सोचता रहा। ‘फिर मैंने एक और हिन्द स्वराज लिखने का निश्चय किया।’ इसका विस्तार से कारण भी बताया। जिसे 16 अगस्त को ‘नेमिचंद जैन स्मृति व्याख्यान’ में उन्होंने सबको बताया। हिन्द स्वराज पर अपनी अवधारणा में वे लगातार नए आयाम जोड़ते जा रहे थे। उनके भाषणों में इसका क्रमिक विकास साफ दिखता था। वे इस सवाल पर आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया से खुद को गुजरते देख रहे थे। जिस रात उनका देहांत हुआ, उसकी सुबह में उन्होंने प्रकाश भाई को फोन मिलाया। बात की। वे मौजूदा समस्याओं का हल हिन्द स्वराज में खोज रहे थे। राजनीतिक व्यवस्था, गरम होती धरती, वैश्वीकरण और बाजार की पत्रकारिता। इन सरोकारों से वे तदाकार हो गए थे। पत्रकारिता को बचाने का तो बीड़ा ही उठा लिया था। नई पीढ़ी के पत्रकारों की इसमें रुचि और लगाव देख महसूस कर वे उत्साहित थे। असल में नई पीढ़ी उनके संचित और अर्जित पुण्य से प्रेरित हो रही थी।
जिन्होंने पंद्रह साल की उम्र में सेवाभावी जीवन जीने का निश्चय किया और जो उसी उम्र में गांव जाकर रहने लगे, उस प्रभाष जोशी का प्रताप केवल पत्रकारों पर ही छाया हुआ नहीं था, बल्कि उसका दायरा बहुत बड़ा था। ऐसी तमाम घटनाएं हैं जिनमें यह देखा जा सकता है। चाहे रेल यात्रा हो या जहाज की। उन्हें देख कर पहचानने और आदरपूर्वक प्रणाम करने वालों की कमी नहीं थी। एक दिन वे मुंबई हवाई अड्डे के बाहर खड़े थे। एक टैक्सी वाला आया। उसने अपनी टैक्सी रोकी और प्रभाष जी की तरफ बढ़ा। उन्होंने समझा कि उसे सवारी की तलाश है, यह समझकर वे मना कर रहे थे, फिर भी वह उनके पास आया और पूछा कि आप प्रभाष जोशी हैं? हां में जवाब सुनकर वह झुका और उनके चरणों में प्रणाम कर खड़ा हो गया। बोला- आपको टीवी पर मैं सुनता हूं। आप बेबाक बोलते हैं। यही कहने के लिए आया था। ऐसी घटनाएं उनके साथ अक्सर होती देखी गई हैं। साफ है कि वे पत्रकारिता के ऋषि स्थान पर पहुंच गए थे। वे सिर्फ शब्दों पर नहीं जीते थे। इस कारण मौलिक थे।
अपनी तरुणाई में उन्होंने देश को नए सिरे से बनाने का सपना देखा था। उस राह से पत्रकारिता में आए थे। वह सपना उनका कभी न मरा, न ठंडा पड़ा। आखिरी दिन तक वे उसके लिए पूरा सक्रिय रहे। नाना प्रकार के प्रभावों से परे थे। वे सत्यान्वेषी थे। लेकिन परंपरागत पध्दति से खोज नहीं करते थे। वे केंद्र से विस्फोट करते थे, परिधि से नहीं। उम्र के साथ शरीर अपना धर्म निभाता है। वह जर्जर हो जाता है। जब ऐसा होता है तो आम आदमी में उदासी छा जाती है। जो शरीर में जीते हैं वे ज्यादा उदास हो जाते हैं। प्रभाष जोशी मन और संकल्प में जीते थे। शरीर के धर्म से बेपरवाह रहते थे। उनको जानने और मानने वाले चाहते थे कि वे शरीर का भी कुछ ख्याल करें। लेकिन वे अपनी धुन के पक्के थे और आत्मविश्वास के धनी थे। समझते थे कि इस उम्र में भी शरीर को साध लेंगे। लिखने-पढ़ने के अलावा जिन आंदोलनों और अभियानों से वे जुड़े थे, वह उनके जीने का निराला ढंग था। सोचते थे कि इससे वैश्वीकरण की हवा को भारत में बहने से रोका जा सकता है। नहीं तो लोगों पर बड़ी विपदा आएगी।
जैसे जिए वैसे ही अनायास वे परलोक चले गए। पिछले महीने एक यात्रा में दो दिन उनके साथ था। देखा कि जब मौका मिलता था वे कुमार गंधर्व का गाए गीत को डूबकर सुनते थे जिसकी लाइन है- ‘मैं जागूं। सतगुरु जागे। आलम सारी सोए।’ यही उस रात भी हुआ। दुनिया सो रही थी और वे चले गए। हम क्यों मानें कि प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह क्यों नहीं समझें कि वे अथक यात्री थे। इहलोक से वे परलोक की यात्रा पर हैं। यानी कीर्ति के संसार में प्रवेश कर गए हैं। व्यक्ति से मानव हो गए हैं। वे अब हर जगह हैं। विराट लोक के हिस्से हैं। त्रासदी यह है कि उन्हें अभी हम व्यक्ति ही मान रहे हैं। तो यह भी समझ लें कि वे लौट कर आएंगे। तमाम लोगों को काम जो सौंप गए हैं। जब तक नहीं आते, प्रभाष दीपो भव हो जाएं।