दिलीप चिंचालकर
कैसी अजीब स्थिति रही होगी भाई साहब के लिए। इधर वापसी यात्रा शुरू हो गई है इधर सचिन ने एक और नया रिकार्ड बना डाला। उस पर न लिखे यह कैसे संभव है? क्रिकेट की दुनिया में जब भी कोई ऊंच-नीच होती प्रभाषजी के लिए लिखना जरूरी हो जाता। और वे सारी दुनिया से पल्ला झाड़कर कागज पर अपनी कलम से स्ट्रोक्स लगाने लगते। आज लिखें न लिखें पल्ला जरूर झाड़ लिया है उन्होंने। दरअसल ये पंक्तियां लिखते हुए किसी भी समय उनके टेलीफोन की घंटी बज सकती है। गुरुजी, राहुलजी, कुमारजी या इंदौर के किसी नामचीन दिवंगत के बारे में पूछने के लिए। क्योंकि, जहां वे अब हैं वहां वे कुछ प्रासंगिक न लिखें या बोलें यह संभव नहीं। और यदि लिखना है तो तथ्यों की प्रमाणिकता परखे बिना उनके लिए आगे बढ़ा नहीं जा सकता। हम-आप सभी तो उनके पात्र थे। मुनमुन (सोपान), लल्ली (सोनाली), माधो (पोता), बहनजी (उषा भाभी) और पालतू श्वान स्तंभ के स्थायी पात्र थे। पढ़ने वाले उनके साथ यों घुलमिल जाते कि लगता वे हमारे चिर-परिचित आत्मीय है। इंदौर में ‘नई दुनिया’ पर दस्तक के दे जाना उनका शगल था। साल दो साल में एक बार ठाठ से आते। लकदक कुरते-धोती के पहनावे में कार नहीं हो तो मजे से किसी के साथ स्कूटर की पिछली सीट पर बैठकर। व्यवसायिकता और प्रतिद्वंदिता के युग में भी नई दुनिया उनका श्रद्धास्थान था। राहुल बारपुते को वे अपना पहला और एकमात्र संपादक मानते थे। परिसर से विदा होते समय उनके भावों से यह बात छुपती नहीं कि वे पुरानी पीढ़ी को धोक देने आए थे। पर अब शायद वे नहीं आएंगे, कभी नहीं।