एक निर्भीक पत्रकार का खोना

वेदप्रताप वैदिक (नई दुनिया, 7 नवंबर)

प्रभाष जोशी के निधन से हिंदी पत्रकारिता का एक सबसे सशक्त स्तंभ ढह गया है। यह कहना बिलकुल भी पारंपरिक नहीं है कि प्रभाष जोशी का निधन हिंदी पत्रकारिता के सांचे से बिलकुल अलग था। एक अर्थ में वे पत्रकार नहीं, समाजसेवक थे। उन्होंने पत्रकारिता को अपनी समाजसेवा का साधन बनाया। प्रभाष जोशी और मेरा पचास वर्ष का संबंध रहा है। क्रिश्चियन कालेज, इंदौर में हम लोग सहपाठी थे। धीरे-धीरे हमारी मित्रता गहरी होती गई। उन्होंने पढ़ते हुए ही बाकायदा पत्रकारिता भी शुरू कर दी। उन्हीं दिनों वे विनोबा जी के प्रभाव से महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों से जुड़ गए। इंदौर में जब हम लोग साथ-साथ पढ़ते थे तो मैं छात्र आंदोलन चलाता था। वे विनोबा जी की गतिविधियों पर शाम को एक पर्चा निकालते थे। यह पर्चा कुछ दिनों नियमित प्रकाशित होता रहा। उन दिनों विनोबा जी इंदौर आए हुए थे। दरअसल, वह गांधी और विनोबा के कामों में उनकी संलग्नता थी।

विनोबा जी के प्रभाव से ही उन्होंने गांवों में स्वच्छता अभियान चलाया। सिनेमा के अश्लील पोस्टरों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी, उसमें हम सब नौजवान भाग लेते, विनोबा जी के विचार और उनकी गतिविधियों का प्रचार करते थे। प्रभाष जी में समाजसेवा का यह भाव अंत तक बना रहा। वे अंत तक यात्राएं करते रहे, भाषण देते रहे और समाज सेवा के काम में जुटे रहे। विनोबा जी के विचारों से प्रेरित और प्रभावित समाजसेवा का ही काम था कि प्रभाष जी ने विधिवत पत्रकारिता भी शुरू कर दी। बकायदा उन्होंने ‘नई दुनिया’ में आरंभ किया। राजेंद्र माथुर भी नई दुनिया से जुड़े थे हालांकि वे तब गुजराती कालेज में व्याख्याता भी थे। मैं भी इन दोनों से बराबर संपर्क में रहता। बाद में नई दुनिया का दफ्तर कड़ाव घाट से छावनी में आ गया। मुझे कालेज में पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों से जो समय मिलता उसमें ‘नई दुनिया’ में जाकर बैठता था। वहां प्रभाष जी और राजेंद्र माथुर के साथ विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होती। चर्चा में कई बार असहमतियां भी होती लेकिन आत्मीयता दिनोदिन गहरी होती गई। इतनी गहरी कि हम दोनों में कभी कोई अंतराल महसूस नहीं हुआ।

बातचीत करते हुए सर्राफे, छावनी और बोझांकेट बाजार में निकल जाते, वहां दुकानों पर खड़े होकर खाया-पिया करते थे। प्रभाष जी खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। पढ़ाई के दिनों में कालेज से अकसर मेरे घर आ-जाया करते। उनके आने की सूचना पाकर माता जी कहती कि प्रभाष आ रहा है उसके लिए बाफले बनाना। घर आने के बाद वे खुद भी खाना बनाने में जुट जाते थे। यह जिक्र इसलिए कि प्रभाष जी में मालवी फक्कड़पन भरा हुआ था। इसलिए उन्होंने पढ़ाई-लिखाई में भी खास रुचि नहीं ली और औपचारिक शिक्षा में आगे नहीं गए। कालेज के दिनों में मैंने उनसे कई बार आग्रह किया और ऐसी व्यवस्था भी बनाई कि उपस्थिति कम होने के बावजूद वे परीक्षा में बैठ सकें लेकिन इस मस्ती में फक्कड़पन के चलते उन्होंने कभी परवाह नहीं की। उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी लेकिन उनमें तीव्र प्रतिभा थी। वे बहुत अच्छे लेख लिखने लगे थे। नई दुनिया में उनके जिम्मे खेल-कूद की रिपोर्टिंग, समाचार लाने और टिप्पणियों का काम आया वे खेल-कूद की घटनाओं पर सधी हुई टिप्पणियां लिखते। इन टिप्पणियों और अन्य विषयों पर लेखन से ही उनकी प्रतिभा का परिचय मिलता है। औपचारिक पढ़ाई नहीं होने के बावजूद उन्होंने इतनी योग्यता अर्जित कर ली और आत्मविश्वास उभरा कि पी. एच. डी. और डाक्टरेट कर लेने वाले विद्वान भी उनके मुकाबले टिक नहीं पाते थे। वे अपनी जानकारी और पैठ के बल पर बड़े-बड़े प्रोफेसरों के भी छक्के छुड़ा सकते थे यह स्थिति उन्होंने दिन-रात पत्रकारिता में खटने और जीवन से सीखते हुए अर्जित की थी।

दिल्ली आने के बाद प्रभाष जी ने गांधी निधि को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। यहां वे सर्वोदयी पत्र-पत्रिकाओं पर संपादन करते। इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस समूह से जुड़े और ‘प्रजानीति’ तथा ‘आसपास’ साप्ताहिक पत्रों के लिए काम करने लगे। ‘प्रजा नीति’ के संपादक प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’ थे। हालांकि पत्र का वास्तविक काम प्रभाष जी ही देखते थे। बाद में जब उन्होंने ‘जनसत्ता’ अखबार शुरू किया, इस पत्र से पुराने प्रतिष्ठित अखबारों की प्रसार संख्या पर कोई खास असर नहीं पड़ा लेकिन जो तेवर, साफगोई और निर्भीकता की मिसाल उन्होंने दी उसने हिंदी पत्रकारिता में नई लीक गाड़ दी। अखबार प्रसार संख्या में कभी अव्वल नहीं रहा लेकिन प्रभाव में वह हमेशा अव्वल रहा। इसका श्रेय अकेले प्रभाष जोशी को जाता है। उनमें स्वभाव से जो फक्कड़पन था वह उनके लेखन में भी झलकता था। उन दिनों पंजाब में फैल रहे आतंकवाद के खिलाफ उन्होंने जिस तेजस्विता का परिचय दिया, उसे मैं आज भी प्रणाम करता हूं। कलम को तलवार की तरह चलाना और अपने सिर को तलवार की नोक पर रखकर लिखना यदि किसी से सीखना हो तो प्रभाष जोशी से सीखें। उनकी जान को हमेशा खतरा बना रहता था लेकिन उनकी कलम कभी नहीं कांपी।

जो सही लगे वह लिखना और बिना किसी संकोच के लिखना उनकी विशेषता थी। यह विशेषता विरलों में ही मिलती है। प्रभाष भाई के फक्कड़पन का हाल यह था कि सारा देश जब रूपकंवर के सती होने पर हाय-हाय कर रहा था तो वे इसके समर्थन में लिख रहे थे। प्रवाह के विरुद्ध तैरने की क्षमता हर किसी में नहीं होती। जहां तक मेरी जानकारी है प्रभाष जोशी के कार्यकाल में जितने मुकदमे जनसत्ता की खबरों को लेकर चले, उतने किसी अखबार की खबरों पर नहीं चले होंगे। प्रतिद्वंद्वी संपादक इसे गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता का सबूत कहते थे लेकिन मैं इसे साहसिक पत्रकारिता मानता हूं। उन्होंने ऐसा इस्पात भर दिया था कि वे लोहे के सैनिकों की तरह लड़ते थे और वे उन पत्रकारों से बेखौफ होकर खबरें भेजने के लिए कहते थे। संपादक के तौर पर जो आजादी प्रभाष जोशी को मिली वह दिल्ली में शायद ही किसी अन्य संपादक को मिली। अपनी संपादकीय आजादी का उन्होंने जबर्दस्त उपयोग किया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रभाष जी के पुराने साथियों में रहे है।)

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