Revised draft report prepared on April 01, 2010, for circulation among members of the Press Council of India “Paid News”: How corruption in the Indian media undermines democracy Click here for Full Report
हम क्यों मानें कि प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह क्यों नहीं समझें कि वे अथक यात्री थे। इहलोक से वे परलोक की यात्रा पर हैं। यानी कीर्ति के संसार में प्रवेश कर गए हैं। व्यक्ति से मानव हो गए हैं। वे अब हर जगह हैं। विराट लोक के हिस्से हैं। त्रासदी यह है कि उन्हें अभी हम व्यक्ति ही मान रहे हैं। तो यह भी समझ लें कि वे लौट कर आएंगे। तमाम लोगों को काम जो सौंप गए हैं। जब तक नहीं आते, प्रभाष दीपो भव हो जाएं।
प्रभाषजी की यह खासियत थी कि वे योजनाएं ऐसी बनाते जैसे अगले सौ साल तक जीना हो। लेकिन साथ ही उनके क्रियान्वयन के लिए टीम बनाने और लोगों को सहेजने समझाने की इतनी गंभीर कोशिश करते जैसे उन्हें जीने के लिए आज का ही दिन मिला है। अपनी इसी विशेषता के कारण उन्होंने यात्रा के दौरान मुझसे सात कामों का जिक्र किया।
कैसी अजीब स्थिति रही होगी भाई साहब के लिए। इधर वापसी यात्रा शुरू हो गई है इधर सचिन ने एक और नया रिकार्ड बना डाला। उस पर न लिखे यह कैसे संभव है? क्रिकेट की दुनिया में जब भी कोई ऊंच-नीच होती प्रभाषजी के लिए लिखना जरूरी हो जाता। और वे सारी दुनिया से पल्ला झाड़कर कागज पर अपनी कलम से स्ट्रोक्स लगाने लगते।
प्रभाष जोशी और मेरा पचास वर्ष का संबंध रहा है। क्रिश्चियन कालेज, इंदौर में हम लोग सहपाठी थे। धीरे-धीरे हमारी मित्रता गहरी होती गई। उन्होंने पढ़ते हुए ही बाकायदा पत्रकारिता भी शुरू कर दी। उन्हीं दिनों वे विनोबा जी के प्रभाव से महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों से जुड़ गए।
उनके प्रोफेशन पर विचार करें तो अपने सब्जेक्ट पर उनकी बड़ी अच्छी पकड़ थी। उनका बहुत बड़ा रेंज था और जिन विषयों पर वे लिखते थे, उनके बारे में उनके पास पर्याप्त जानकारी रहती थी। सांप्रदायिकता के खिलाफ उन्होंने काफी प्रभावी लेखन किया। इसके अलावा उन्होंने खेलों पर भी काफी लिखा, खासकर क्रिकेट पर। भारतीय संस्कृति और परंपरा की उनकी समझ काफी गहरी थी।
कुल मिलाकर अज्ञेय और राजेंद्र माथुर के बाद मैं उन्हें हिंदी का तीसरा सबसे बड़ा पत्रकार मानता हूं। यह भी सच है कि ‘जनसता’ अखबार के जरिए उन्हें खुद को साबित करने का लंबा वक्त मिला वे लगातार लिखते रहे और अंतिम क्षणों तक सक्रिय रहे।
हिंदी प्रदेश में प्रभाष जोशी एक समग्र बौद्धिक केंद्र थे और ऐसा ही वातावरण बनाने के लिए अंतिम समय तक सक्रिय रहे। प्रभाष जी को आधुनिक भारत का सबसे बड़ा पत्रकार कहा जाए, तो इसमें अतिशयोक्ति का एक कतरा भी नहीं है।
यह भाषण श्री प्रभाष जोशी द्वारा दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में नेमीचंद व्याख्यानमाला के अंतर्गत दिया गया.